न्यूज डेस्क/चौपाल Today। भारत में स्कूली बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार नई पहल कर रही है। वर्षों से लागू मिड-डे मील (दोपहर का भोजन) योजना ने बच्चों को स्कूल से जोड़ने और उनके पोषण स्तर में सुधार करने में अहम भूमिका निभाई है। अब इसी दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। केंद्र सरकार मिड-डे मील के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में सुबह का पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। गुजरात और कर्नाटक में इस पहल के सफल प्रयोग के बाद अब इसे देशभर में लागू करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

खाली पेट पढ़ाई की चुनौती
भारत में बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। कई बार घर की परिस्थितियों के कारण बच्चे बिना नाश्ता किए ही स्कूल पहुंचते हैं। खाली पेट स्कूल आने वाले बच्चों के लिए पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना कठिन हो जाता है। भूख के कारण उनमें थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी देखी जाती है, जिसका सीधा असर उनके शैक्षणिक प्रदर्शन पर पड़ता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सुबह का नाश्ता बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। संतुलित नाश्ता न केवल ऊर्जा प्रदान करता है, बल्कि याददाश्त, सीखने की क्षमता और व्यवहार पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। इसी सोच के साथ अब सरकार स्कूलों में नाश्ता योजना को आगे बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है।
गुजरात और कर्नाटक का अनुभव
गुजरात और कर्नाटक ऐसे दो राज्य हैं जहां सरकारी स्कूलों में बच्चों को सुबह का नाश्ता देने की शुरुआत की गई है। इन राज्यों के अनुभव अब पूरे देश के लिए एक मॉडल के रूप में देखे जा रहे हैं।
गुजरात में स्कूलों में बच्चों को दूध, फल, पोहा, उपमा और अन्य हल्के लेकिन पौष्टिक विकल्प दिए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे दिन की शुरुआत ऊर्जा और पोषण के साथ करें। वहीं कर्नाटक में स्थानीय खान-पान को ध्यान में रखते हुए नाश्ते का मेन्यू तैयार किया गया है, जिससे बच्चों को स्वाद के साथ पोषण भी मिले।
इन दोनों राज्यों से सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, नाश्ता योजना शुरू होने के बाद स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति में सुधार हुआ है। खासकर प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन और नियमितता बढ़ी है। शिक्षकों ने भी यह महसूस किया है कि नाश्ता करने के बाद बच्चे कक्षा में ज्यादा सक्रिय और सतर्क रहते हैं।
केंद्र सरकार की रणनीति
गुजरात और कर्नाटक के सकारात्मक अनुभवों को देखते हुए केंद्र सरकार अब अन्य राज्यों को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इसके लिए सभी राज्यों के साथ इन दोनों राज्यों के प्लान और कार्यान्वयन मॉडल साझा किए गए हैं। इसके अलावा से जुड़ी बैठकों के दौरान राज्यों से कहा गया है कि वे अपने स्तर पर नाश्ता योजना को लेकर विस्तृत प्रस्ताव तैयार करें।
केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि बच्चों के समग्र विकास के लिए सिर्फ दोपहर का भोजन पर्याप्त नहीं है। यदि सुबह से ही बच्चों को पौष्टिक आहार मिल जाए, तो इसका असर उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य पर लंबे समय तक देखने को मिलेगा।
स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजना
सरकार इस योजना को पूरे देश में एक समान तरीके से लागू करने के बजाय राज्यों को लचीलापन देना चाहती है। राज्यों से कहा गया है कि वे अपनी स्थानीय परिस्थितियों, खाद्य आदतों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार नाश्ते का मेन्यू तय करें। इससे न केवल भोजन की स्वीकार्यता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय किसानों और आपूर्तिकर्ताओं को भी लाभ मिल सकेगा।
उदाहरण के तौर पर, दक्षिण भारत में इडली, उपमा या डोसा जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं, जबकि उत्तर भारत में पोहा, दलिया या दूध-फल जैसे विकल्प दिए जा सकते हैं। इस तरह नाश्ता योजना स्थानीय संस्कृति के अनुरूप होगी और बच्चों को भी पसंद आएगी।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्कूलों में नियमित रूप से सुबह का नाश्ता दिया जाता है, तो इसके कई सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। बच्चों में कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याओं में कमी आएगी। साथ ही स्कूलों में ड्रॉपआउट दर घटेगी और बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बचपन में सही पोषण मिलने से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है, जिसका लाभ उन्हें आगे चलकर भी मिलता है। इस तरह यह योजना केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी निवेश मानी जा सकती है।
चुनौतियां और समाधान
हालांकि यह योजना बेहद लाभकारी है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। जैसे अतिरिक्त बजट की व्यवस्था, रसोई सुविधाओं का विस्तार, भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता बनाए रखना, तथा समय पर नाश्ता उपलब्ध कराना। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय और निगरानी की जरूरत होगी।
सरकार का मानना है कि यदि मौजूदा मिड-डे मील ढांचे का सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो इन चुनौतियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही सामुदायिक सहभागिता और स्थानीय निकायों की मदद से योजना को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
मिड-डे मील के साथ सुबह का पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराने की योजना भारत के स्कूली बच्चों के लिए एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव साबित हो सकती है। गुजरात और कर्नाटक के सफल प्रयोग यह दिखाते हैं कि सही योजना और इच्छाशक्ति के साथ इस पहल को सफल बनाया जा सकता है। यदि इसे पूरे देश में लागू किया जाता है, तो यह न केवल बच्चों के पोषण स्तर में सुधार लाएगी, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और स्कूलों में बच्चों की भागीदारी को भी मजबूत करेगी। यह पहल एक स्वस्थ, शिक्षित और सशक्त भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है।
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