नई दिल्ली/जयपुर | 26 दिसंबर, 2025
भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला, अरावली, आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े कानूनी और पर्यावरणीय संकट से जूझ रही है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली को परिभाषित करने के लिए अपनाए गए नए ‘ऊंचाई-आधारित मानदंडों’ (100 मीटर की सीमा) ने देश भर के पर्यावरणविदों और नागरिक समूहों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है।
‘अरावली विरासत जन अभियान’ की सदस्य और प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता नीलम अहलूवालिया ने इस मुद्दे पर सरकार और नीतियों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अरावली की पहचान को सीमित करना न केवल प्रकृति के साथ अन्याय है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विनाशकारी मिसाल कायम करेगा।

1. परिभाषा का विवाद: 100 मीटर की ऊंचाई का गणित
दिसंबर 2025 में चर्चा का मुख्य केंद्र सरकार द्वारा दी गई वह नई परिभाषा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया है। इसके तहत अब केवल उन्हीं भू-आकृतियों को ‘अरावली’ माना जाएगा जिनकी ऊंचाई स्थानीय भूतल से 100 मीटर या उससे अधिक है।
नीलम अहलूवालिया ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “यह एक बहुत ही खतरनाक मिसाल है कि आप भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला को केवल ऊंचाई के तराजू पर तौल रहे हैं। आज आप अरावली की परिभाषा बदल रहे हैं, कल आप कहेंगे कि यह हिमालय नहीं है, यह पश्चिमी घाट नहीं है या यह गंगा नहीं है।” उनका मानना है कि प्रकृति को इस तरह ‘मायोपिक’ (संकीर्ण) दृष्टिकोण से देखना वैज्ञानिक और तार्किक रूप से गलत है।
2. ‘सतत खनन’ (Sustainable Mining) पर कड़ा प्रहार
सरकार और खनन विभागों द्वारा अक्सर ‘सतत खनन’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। नीलम ने इस शब्दावली को ही विरोधाभासी करार दिया। उन्होंने तर्क दिया, “खनन अपनी प्रकृति में ही ‘एक्सट्रैक्टिव’ (निष्कर्षण आधारित) है। यह विनाश का कारण बनता है। खनन में कुछ भी ‘सतत’ नहीं है।” उन्होंने जमीनी हकीकत का हवाला देते हुए बताया कि जहां भी खनन की अनुमति दी गई है, वहां पहाड़ियां पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं और पूरा क्षेत्र जंगलों से विहीन हो चुका है। उनके अनुसार, यह कहना कि खनन पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है, लोगों और पर्यावरण के साथ एक “क्रूर मजाक” है।
3. पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश: रेगिस्तान की दस्तक
अरावली केवल पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के लिए एक ‘ग्रीन बैरियर’ (हरा कवच) है।
- मरुस्थलीकरण: अरावली थार रेगिस्तान को हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ने से रोकती है। पहाड़ियों के टूटने से रेगिस्तानी धूल और गर्मी का विस्तार तेजी से हो रहा है।
- वन्यजीवों का अंत: नीलम अहलूवालिया का कहना है कि खनन क्षेत्रों से तेंदुए, लकड़बग्घे और नीलगाय जैसे वन्यजीव पूरी तरह से गायब हो गए हैं। उनके आवास नष्ट होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।
- जल संकट: अरावली की पहाड़ियों में प्राकृतिक दरारें होती हैं जो वर्षा जल को जमीन के नीचे पहुँचाती हैं। खनन से ये ‘वॉटर रिचार्ज’ जोन खत्म हो रहे हैं, जिससे राजस्थान और हरियाणा के कई इलाकों में भूजल स्तर 2000 फीट तक नीचे चला गया है।
4. जन अभियान और लोगों की आवाज
नीलम अहलूवालिया के नेतृत्व में ‘अरावली विरासत जन अभियान’ ने राजस्थान के जयपुर और हरियाणा के विभिन्न हिस्सों में ग्रामीणों और नागरिक समूहों को लामबंद किया है। हाल ही में ‘इंटरनेशनल माउंटेन डे’ के अवसर पर इस अभियान ने सरकार से मांग की कि अरावली की पुरानी परिभाषा को बहाल किया जाए।
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कार्यकर्ताओं ने बताया कि राजस्थान में लगभग 12,081 पहाड़ियां हैं, जिनमें से केवल 1,048 ही नई परिभाषा (100 मीटर ऊंचाई) के तहत आती हैं। इसका मतलब है कि अरावली का लगभग 90% हिस्सा अब आधिकारिक रूप से ‘पहाड़’ नहीं कहलाएगा और वहां खनन की राह आसान हो जाएगी।
5. क्या है भविष्य की चुनौती?
नीलम अहलूवालिया का तर्क है कि अगर इन छोटी पहाड़ियों और ‘स्क्रब फॉरेस्ट’ को नहीं बचाया गया, तो दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता और उत्तर भारत की जल सुरक्षा कभी ठीक नहीं हो पाएगी। उनके शब्दों में, “यह पारिस्थितिकी तंत्र पर एक बहुत बड़ा हमला है। जब आप एक पहाड़ को काटते हैं, तो आप केवल पत्थर नहीं निकालते, आप उस पूरे क्षेत्र की सांसें छीन लेते हैं।”

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