रूस की राजधानी मॉस्को में आज भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक राजनीति बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है, और भारत-रूस संबंधों को नई मजबूती और दिशा देना बेहद आवश्यक माना जा रहा है। यह बैठक न केवल कूटनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं का भी दीर्घकालिक प्रभाव देखा जाएगा।

भारत-रूस संबंधों की वर्तमान परिस्थिति
पिछले कुछ वर्षों में रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव किए हैं। इस स्थिति में भारत की भूमिका अत्यंत संतुलित रही है। भारत हमेशा से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक रहा है जहाँ सहयोग, आपसी सम्मान और स्वतंत्र निर्णय-क्षमता को प्राथमिकता दी जाती है।
ऐसे माहौल में डॉ. जयशंकर और पुतिन की मुलाकात दिखाती है कि भारत और रूस अपनी दोस्ती को और गहरा करने के लिए तैयार हैं, चाहे दुनिया में कितने ही बदलाव क्यों न हो रहे हों।
बैठक में क्या-क्या चर्चा हुई
आज की बैठक कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर केंद्रित रही। हालाँकि दोनों नेताओं ने आधिकारिक बयान में ज्यादा जानकारी साझा नहीं की, लेकिन सामरिक विश्लेषण से अनुमान लगाया जा सकता है कि निम्न विषय सबसे प्रमुख रहे:
1. रक्षा और सुरक्षा सहयोग
भारत और रूस दशकों से रक्षा सहयोग में मजबूत साझेदार रहे हैं। ब्रह्मोस मिसाइल, सुखोई-30, टी-90 टैंक, एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम जैसे कई अहम हथियार सिस्टम रूस से ही आते हैं।
भारत चाहता है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद रूस से रक्षा उपकरणों की सप्लाई बाधित न हो। इस बैठक में:
- नई रक्षा परियोजनाओं
- संयुक्त उत्पादन
- तकनीकी सहयोग
- आधुनिक सैन्य प्रणालियों
पर चर्चा होने की पूरी संभावना है।
2. ऊर्जा और कच्चे तेल पर सहयोग
पिछले दो वर्षों में भारत ने रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली है।
आज की बैठक में ऊर्जा आपूर्ति, भुगतान तंत्र, और तेल-गैस परियोजनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई होगी। रूस चाहता है कि भारत उसके ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण साझेदार बने रहे और भारत भी स्थिर कीमतों पर ऊर्जा सुनिश्चित करना चाहता है।
3. आर्थिक साझेदारी
भारत-रूस व्यापार 2024-25 में नए रिकॉर्ड पर पहुँचा था, लेकिन इसमें व्यापार असंतुलन भी देखा गया।
भारत रूस को मशीनरी, फार्मा, आईटी और कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाना चाहता है।
बैठक में व्यापार संतुलन और भविष्य की आर्थिक रणनीतियों पर चर्चा अत्यंत महत्वपूर्ण रही होगी।
4. यूक्रेन युद्ध पर भारत का दृष्टिकोण
यूक्रेन-रूस संघर्ष अब लंबे समय से चल रहा है। भारत का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है — युद्ध का समाधान बातचीत और राजनयिक प्रयासों से ही संभव है।
आज की बैठक में भारत ने शांति और स्थिरता के वैश्विक प्रयासों पर अपने विचार साझा किए।
5. बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग
BRICS, SCO, G20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत और रूस सहयोगी भूमिका निभाते हैं।
पुतिन की भारत यात्रा निकट है, इसलिए इस बैठक में दोनों देशों ने आगामी वैश्विक कार्यक्रमों की तैयारी पर भी चर्चा की।
बैठक के रणनीतिक मायने
यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि कई गहरे संदेश देती है:

1. भारत स्वतंत्र विदेश नीति जारी रखेगा
भारत पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत रखते हुए, रूस से भी दूरी नहीं बनाना चाहता।
यह बैठक दिखाती है कि भारत अपनी विदेश नीति अपने हितों के अनुसार ही तय करेगा।
2. रूस एशिया में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस का एशिया की ओर झुकाव बढ़ा है।
भारत उसके लिए सबसे प्रभावशाली रणनीतिक साझेदार है।
3. रक्षा सप्लाई चेन को स्थिर रखने की तैयारी
भारत की सेना रूसी तकनीक पर काफी निर्भर है।
यह बैठक रक्षा उपकरणों की समय पर आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक थी।
आगे क्या देखने को मिलेगा
आज की बैठक के बाद आने वाले हफ्तों में कई बड़े घटनाक्रम हो सकते हैं:
- भारत-रूस शिखर सम्मेलन में नए समझौतों की घोषणा
- रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में नई परियोजनाएँ
- भारत द्वारा रूसी फार ईस्ट में निवेश बढ़ाने की संभावनाएँ
- व्यापार असंतुलन कम करने के लिए नए उपाय
- दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर तेजी
भारत और रूस दोनों मानते हैं कि विश्व राजनीति में आने वाले दशकों में उनकी साझेदारी और भी महत्वपूर्ण होगी।
निष्कर्ष
मॉस्को में आज हुई डॉ. एस. जयशंकर और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बैठक भारत-रूस संबंधों को नई दिशा देने वाला बड़ा कदम है।
यह मुलाकात दर्शाती है कि अंतरराष्ट्रीय दबावों और भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद, दोनों देशों की साझेदारी भरोसे, सहयोग और दीर्घकालिक रणनीतिक सोच पर आधारित है।
आने वाले समय में यह साझेदारी रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक कूटनीति के क्षेत्र में न सिर्फ मजबूत होगी, बल्कि विश्व राजनीति के बदलते स्वरूप को भी प्रभावित करेगी।
