विशेष संवाददाता, कोलकाता | 26 दिसंबर, 2025
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और नागरिक विरोध का केंद्र बन गई है। शहर के व्यस्त और संवेदनशील इलाके पार्क सर्कस में स्थित बांग्लादेश उप-उच्चायोग (Deputy High Commission) के बाहर शुक्रवार को हुए एक बड़े प्रदर्शन ने कानून-व्यवस्था की स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में पुलिस ने 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिन्हें कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत से जमानत मिल गई है।

1. विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि: आखिर क्यों उबला कोलकाता?
पिछले कुछ हफ्तों से पड़ोसी देश बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और सांप्रदायिक तनाव की खबरें लगातार सुर्खियों में हैं। विशेष रूप से बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के मंदिरों पर हमले, संपत्ति के नुकसान और इस्कॉन (ISKCON) के प्रखर आध्यात्मिक नेता चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने भारत के सीमावर्ती राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में भारी आक्रोश पैदा किया है।
कोलकाता के विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराने के लिए ‘बांग्लादेश उप-उच्चायोग’ को चुना। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि कोलकाता में स्थित यह कार्यालय बांग्लादेश सरकार का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उन तक अपनी आवाज पहुँचाना सबसे प्रभावी तरीका है।
2. घटनाक्रम: बैरिकेड्स, नारेबाजी और पुलिसिया कार्रवाई
शुक्रवार दोपहर करीब 1:30 बजे, प्रदर्शनकारियों की भीड़ पार्क सर्कस के पास इकट्ठा होने लगी। हाथों में तख्तियां, भगवा झंडे और बैनर लिए लोग “बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दो” और “चिन्मय प्रभु को रिहा करो” जैसे नारे लगा रहे थे।
सुरक्षा घेरा: चूंकि उप-उच्चायोग एक उच्च-सुरक्षा वाला राजनयिक क्षेत्र है, कोलकाता पुलिस ने पहले से ही वहां त्रि-स्तरीय सुरक्षा घेरा (Three-tier Security) तैयार किया था। इलाके में धारा 144 लागू थी, जिसके तहत पांच या अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी थी।
जब भीड़ ने पुलिस के पहले सुरक्षा घेरे को पार कर सीधे दूतावास के गेट की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो स्थिति तनावपूर्ण हो गई। पुलिस ने लाउडस्पीकर के माध्यम से भीड़ को तितर-बितर होने की चेतावनी दी, लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं थे। इसके बाद पुलिस ने हल्का बल प्रयोग किया और 12 प्रमुख प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया, जिन्हें बाद में गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने (Unlawful Assembly) और सरकारी ड्यूटी में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
3. कानूनी मोड़: अदालत की कार्यवाही और जमानत
गिरफ्तार किए गए 12 व्यक्तियों को शनिवार दोपहर कोलकाता की अलीपुर जिला अदालत में पेश किया गया। कोर्ट रूम के बाहर भी बड़ी संख्या में उनके समर्थक और वकील इकट्ठा थे।
- पुलिस का तर्क: सरकारी वकील ने दलील दी कि राजनयिक मिशनों की सुरक्षा वियना कन्वेंशन (Vienna Convention) के तहत एक अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है। प्रदर्शनकारियों ने न केवल कानून तोड़ा बल्कि सुरक्षा कर्मियों के साथ हाथापाई भी की, जिससे एक अंतरराष्ट्रीय संकट खड़ा हो सकता था। पुलिस ने आगे की जांच के लिए उनकी हिरासत की मांग की।
- बचाव पक्ष का तर्क: प्रदर्शनकारियों के वकीलों ने तर्क दिया कि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है जहां शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों का इरादा हिंसा करना नहीं, बल्कि केवल अपना दुख और आक्रोश जताना था।
न्यायाधीश ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद टिप्पणी की कि सुरक्षा बनाए रखना जरूरी है, लेकिन नागरिक अधिकारों को पूरी तरह से दबाया नहीं जा सकता। अदालत ने सभी 12 आरोपियों को व्यक्तिगत मुचलके पर जमानत दे दी।
4. कूटनीतिक प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी
यह घटना केवल एक स्थानीय विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि इसके गहरे कूटनीतिक मायने हैं। भारत और बांग्लादेश के संबंध वर्तमान में एक नाजुक मोड़ पर हैं। ढाका में सत्ता परिवर्तन के बाद से ही दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद उभरे हैं।
कोलकाता में स्थित बांग्लादेश उप-उच्चायोग पर किसी भी प्रकार का हमला या वहां होने वाला विरोध प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को प्रभावित कर सकता है। भारत सरकार ने बार-बार यह दोहराया है कि वह विदेशी राजनयिकों और उनके परिसरों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। हालांकि, देश के भीतर उठने वाली भावनाओं को संतुलित करना राज्य और केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
5. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक घमासान
इस घटना ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी आग लगा दी है:
- भाजपा और हिंदूवादी संगठन: इन्होंने गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की और ममता बनर्जी सरकार पर “तुष्टीकरण की राजनीति” करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि सरकार पड़ोसी देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबा रही है।
- तृणमूल कांग्रेस (TMC): सत्ताधारी दल ने स्पष्ट किया कि उन्हें बांग्लादेश के हालातों पर चिंता है, लेकिन वे किसी को भी कानून हाथ में लेने या राजनयिक क्षेत्रों की सुरक्षा भंग करने की अनुमति नहीं दे सकते।
- वामपंथी और अन्य दल: इन दलों ने भी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की है, लेकिन उन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रति आगाह किया है।
6. विश्लेषण: क्या है भविष्य की राह?
कोलकाता की सड़कों पर दिखा यह गुस्सा आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है यदि बांग्लादेश में स्थिति में सुधार नहीं होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
- राजनयिक संवाद: भारत को आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश के साथ अल्पसंख्यकों के मुद्दे को और अधिक प्रभावी ढंग से उठाने की जरूरत है ताकि जनता का गुस्सा शांत हो सके।
- सुरक्षा प्रोटोकॉल: कोलकाता पुलिस को ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में ‘क्रॉस-बॉर्डर भावनाओं’ को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रशिक्षण और सुरक्षा योजना बनाने की आवश्यकता है।
- नागरिक समाज की भूमिका: यह आवश्यक है कि विरोध प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण रखा जाए ताकि मुख्य मुद्दा (मानवाधिकार) भटक न जाए।

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