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लौह पुरुष को गढ़ने वाले प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार का निधन: भारतीय कला जगत के एक युग का अंत

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न्यूज डेस्क/चौपाल Today। भारत के महान मूर्तिकार और आधुनिक भारतीय शिल्पकला के स्तंभ राम वनजी सुतार का 100 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही भारतीय कला जगत ने एक ऐसे शिल्पी को खो दिया है, जिनकी कृतियों ने न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय कला की पहचान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। राम सुतार को विशेष रूप से दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के डिज़ाइनर के रूप में जाना जाता है, जो लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल को समर्पित है।

राम सुतार का जन्म महाराष्ट्र के धुले जिले के एक छोटे से गाँव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे राम सुतार को बचपन से ही मिट्टी और पत्थरों से आकृतियाँ बनाने का शौक था। यही शौक आगे चलकर उनका जीवन लक्ष्य बन गया। उन्होंने कड़ी मेहनत और लगन के बल पर कला की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। मुंबई के प्रतिष्ठित जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने मूर्तिकला के क्षेत्र में कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उनका करियर कई दशकों तक फैला रहा, जिसमें उन्होंने देश के अनेक महान नेताओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएँ तैयार कीं। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसी शख्सियतों की मूर्तियाँ उनके कौशल का जीवंत उदाहरण हैं। उनकी बनाई गई प्रतिमाएँ सिर्फ पत्थर या धातु की आकृतियाँ नहीं थीं, बल्कि उनमें भाव, विचार और इतिहास की झलक साफ दिखाई देती थी।

राम सुतार की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का डिज़ाइन तैयार करना रहा। 182 मीटर ऊँची यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति है और भारत की इंजीनियरिंग क्षमता तथा सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक मानी जाती है। इस परियोजना ने न केवल भारत का नाम विश्व मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित किया, बल्कि राम सुतार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशेष पहचान दिलाई। इस विशाल परियोजना के बावजूद, उनकी सादगी और विनम्रता हमेशा बनी रही।

अपने लंबे और समर्पित जीवन में राम सुतार को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया। उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए गए। ये सम्मान उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति भर थे, जबकि असली सम्मान उन्हें जनता के दिलों में मिला। उनकी बनाई प्रतिमाएँ आज भी देश के कई शहरों, संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों पर लोगों को प्रेरित करती हैं।

राम सुतार के निधन की खबर के बाद देशभर में शोक की लहर दौड़ गई। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों, कलाकारों और कला प्रेमियों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। सभी ने एक स्वर में माना कि राम सुतार का जाना भारतीय कला के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी असाधारण संकल्प और मेहनत से विश्व स्तर पर पहचान बना सकता है।

हालाँकि राम सुतार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला और कृतियाँ उन्हें हमेशा जीवित रखेंगी। उनकी बनाई मूर्तियाँ आने वाली पीढ़ियों को न केवल इतिहास से परिचित कराएंगी, बल्कि यह भी सिखाएंगी कि कला के माध्यम से राष्ट्र की आत्मा को कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है। राम सुतार का जीवन भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा है कि सपने कितने भी बड़े क्यों न हों, उन्हें साकार किया जा सकता है।

अंततः, राम सुतार का निधन एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरे युग का अंत है। भारतीय कला, संस्कृति और शिल्पकला में उनका योगदान अमिट रहेगा। देश उन्हें एक महान कलाकार, सच्चे कर्मयोगी और भारतीय गौरव के प्रतीक के रूप में हमेशा याद रखेगा।

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