नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने 1995 के एक बहुचर्चित धोखाधड़ी और जालसाजी मामले में पूर्व महाराष्ट्र मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के वरिष्ठ नेता को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि (कन्विक्शन) पर अंतरिम रोक लगा दी है। साथ ही अदालत ने इस मामले में कोकाटे की याचिका पर को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।
यह मामला महाराष्ट्र में एक सरकारी आवास योजना से जुड़ा हुआ है, जिसमें कोकाटे पर धोखाधड़ी और दस्तावेजों में जालसाजी के आरोप लगे थे। निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई थी। इस सजा के खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला और उसकी सीमाएं
पिछले सप्ताह ने माणिकराव कोकाटे को आंशिक राहत देते हुए उनकी दो साल की जेल की सजा को निलंबित कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अदालत का कहना था कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसाई) यह संकेत मिलता है कि मामले में कोकाटे की भूमिका रही है।
हाईकोर्ट के इस रुख का सीधा असर कोकाटे के राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता था, क्योंकि दोषसिद्धि बने रहने की स्थिति में जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत उनकी सदस्यता और राजनीतिक गतिविधियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग सकता था।
सुप्रीम कोर्ट से मिली बड़ी राहत
इसके बाद कोकाटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दोषसिद्धि पर रोक की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए प्रथम दृष्टया यह माना कि अपील लंबित रहने के दौरान दोषसिद्धि पर रोक न मिलने से याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति हो सकती है। इसी आधार पर अदालत ने दोषसिद्धि पर अंतरिम रोक लगा दी।
साथ ही, सर्वोच्च अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट करने को कहा है कि दोषसिद्धि पर रोक क्यों न लगाई जाए। इस नोटिस के जरिए राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।
क्या है 1995 का मामला
यह मामला वर्ष 1995 का है, जब महाराष्ट्र में एक सरकारी आवास योजना के तहत लाभार्थियों के चयन और दस्तावेजों को लेकर अनियमितताओं के आरोप सामने आए थे। आरोप है कि कुछ दस्तावेजों में हेरफेर कर पात्रता से इतर लोगों को लाभ पहुंचाया गया। इसी सिलसिले में माणिकराव कोकाटे का नाम सामने आया और उन पर धोखाधड़ी तथा जालसाजी के आरोप तय किए गए।
लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। हालांकि, कोकाटे शुरू से ही आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध बताते रहे हैं और खुद को निर्दोष बताते आए हैं।
राजनीतिक मायने और एनसीपी की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एनसीपी के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि न्यायपालिका ने यह स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय से पहले किसी जनप्रतिनिधि को राजनीतिक रूप से अयोग्य ठहराना उचित नहीं होगा।
एनसीपी के कुछ नेताओं ने इसे “न्याय की जीत” बताते हुए कहा कि अदालत ने संतुलित रुख अपनाया है। वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि दोषसिद्धि पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है और कानून अपना काम करेगा।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक, दोषसिद्धि पर रोक लगना एक असाधारण कदम होता है, जिसे अदालतें बहुत सावधानी से अपनाती हैं। आमतौर पर सिर्फ सजा निलंबित की जाती है, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक तभी लगती है जब अदालत को लगता है कि इससे अपीलकर्ता को गंभीर और अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश अंतिम निर्णय नहीं है। मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत यह तय करेगी कि दोषसिद्धि बरकरार रहेगी या नहीं।
आगे क्या
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। महाराष्ट्र सरकार के जवाब के बाद अदालत इस बात पर विचार करेगी कि दोषसिद्धि पर लगाई गई अंतरिम रोक को आगे बढ़ाया जाए या हटाया जाए।
फिलहाल, माणिकराव कोकाटे के लिए यह फैसला बड़ी राहत लेकर आया है। इससे न सिर्फ उन्हें जेल जाने से राहत मिली है, बल्कि उनकी राजनीतिक सक्रियता पर मंडरा रहा संकट भी फिलहाल टल गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि लंबित मामलों में दोषसिद्धि और सजा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ताकि न्याय भी हो और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा भी बनी रहे।

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