लगभग दो दशकों बाद तारीक़ रहमान की बांग्लादेश वापसी ने केवल वहां की घरेलू राजनीति ही नहीं, बल्कि भारत–बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों पर भी नई बहस छेड़ दी है। भारत के लिए बांग्लादेश सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि सुरक्षा, व्यापार, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता का अहम स्तंभ है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि Tarique Rahman की सक्रिय राजनीति में वापसी से भारत पर क्या असर पड़ सकता है।
पृष्ठभूमि: भारत–बांग्लादेश रिश्तों की मौजूदा स्थिति
पिछले एक दशक में भारत और बांग्लादेश के संबंधों में स्पष्ट सुधार देखने को मिला है।
- सीमा विवादों का समाधान
- आतंकवाद के खिलाफ सहयोग
- रेल, सड़क और जलमार्ग कनेक्टिविटी
- ऊर्जा और व्यापारिक साझेदारी
इन सबने रिश्तों को एक व्यावहारिक और भरोसेमंद आधार दिया है। भारत खास तौर पर बांग्लादेश को पूर्वोत्तर भारत का प्रवेश द्वार मानता है।

1. Tarique Rahman की वापसी: भारत के लिए पहला संकेत
Tarique Rahman की वापसी से भारत में पहला सवाल यही उठा कि:
क्या बांग्लादेश की विदेश नीति की दिशा बदलेगी?
BNP का इतिहास बताता है कि:
- पार्टी का रुख कई बार भारत से दूरी और
- चीन व पाकिस्तान से नज़दीकी वाला रहा है
हालाँकि, आज की वैश्विक राजनीति 2000 के दशक से अलग है। भारत अब इस वापसी को सावधानी और रणनीतिक धैर्य के साथ देख रहा है।
2. सुरक्षा और सीमा प्रबंधन: भारत की सबसे बड़ी चिंता
भारत–बांग्लादेश की 4,000 किमी से ज्यादा लंबी सीमा है।
भारत के लिए अहम मुद्दे:
- अवैध घुसपैठ
- सीमा पार तस्करी
- कट्टरपंथी नेटवर्क
- पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा
BNP शासनकाल के दौरान भारत में यह धारणा बनी थी कि:
- सीमा पर सख्ती कम थी
- भारत-विरोधी तत्वों को जगह मिली
👉 अगर Tarique Rahman भविष्य में सत्ता में प्रभावी भूमिका निभाते हैं, तो भारत सुरक्षा सहयोग को रिश्तों की पहली शर्त बनाए रखेगा।
3. चीन फैक्टर: भारत के लिए रणनीतिक चुनौती
भारत के नजरिये से सबसे संवेदनशील मुद्दा है चीन की बढ़ती मौजूदगी।
BNP का झुकाव:
- चीनी निवेश
- रक्षा सहयोग
- बुनियादी ढांचा परियोजनाओं
की ओर ज्यादा माना जाता रहा है।
अगर Tarique Rahman के प्रभाव में:
- बांग्लादेश–चीन संबंध और गहरे होते हैं
तो भारत के लिए: - बंगाल की खाड़ी में सामरिक दबाव
- क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की चिंता
बढ़ सकती है।
👉 हालांकि, भारत यह भी जानता है कि बांग्लादेश पूरी तरह किसी एक धड़े पर निर्भर नहीं रह सकता।
4. व्यापार और कनेक्टिविटी पर संभावित असर
भारत–बांग्लादेश के बीच:
- अरबों डॉलर का व्यापार
- पूर्वोत्तर के लिए ट्रांजिट
- बंदरगाह और रेलवे कनेक्शन
जैसी परियोजनाएँ चल रही हैं।
संभावित परिदृश्य:
- संतुलित राजनीति → परियोजनाएँ जारी रहेंगी
- भारत-विरोधी बयानबाज़ी → परियोजनाएँ धीमी हो सकती हैं
👉 इसका सीधा असर:
- असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम जैसे राज्यों
- बांग्लादेश के व्यापारिक वर्ग
पर पड़ेगा।
5. चुनावी राजनीति और भारत की नीति
भारत की परंपरागत नीति रही है:
- किसी एक पार्टी का खुला समर्थन नहीं
- लेकिन भारत-विरोधी राजनीति से दूरी
Tarique Rahman की वापसी चुनावी माहौल को तेज़ करेगी। भारत:
- सभी राजनीतिक दलों से संवाद रखेगा
- लेकिन यह साफ करेगा कि
आतंकवाद, हिंसा और अस्थिरता पर समझौता नहीं होगा।
6. आम नागरिकों पर असर: दोनों देशों में
अगर रिश्ते बिगड़ते हैं:
- व्यापार महंगा होगा
- सीमा इलाकों में तनाव
- लोगों के आवागमन पर असर
अगर रिश्ते संतुलित रहते हैं:
- रोज़गार के अवसर
- पर्यटन और व्यापार
- क्षेत्रीय शांति
👉 भारत और बांग्लादेश के आम लोग राजनीतिक तनाव के सबसे बड़े शिकार बनते हैं।
7. भारत की रणनीतिक सोच: इंतज़ार और संतुलन
भारत फिलहाल:
- जल्दबाज़ी में कोई प्रतिक्रिया नहीं देगा
- “Wait and Watch” नीति अपनाएगा
- व्यावहारिक सहयोग को प्राथमिकता देगा
भारत के लिए व्यक्ति नहीं, बल्कि नीतियाँ और व्यवहार मायने रखेंगे।
निष्कर्ष: भारत–बांग्लादेश रिश्ते किस दिशा में?
Tarique Rahman की वापसी:
- भारत के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि
- सतर्क रहने का संकेत है।
✔ रिश्ते तुरंत खराब नहीं होंगे
✔ लेकिन भारत अधिक रणनीतिक होगा
✔ असली असर तब दिखेगा जब बांग्लादेश की सत्ता संरचना बदलेगी
भारतीय दृष्टिकोण साफ है:
स्थिर, शांत और सहयोगी बांग्लादेश ही भारत के हित में है — चाहे नेतृत्व कोई भी करे।

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